कानपुर में धूल का ‘साइलेंट किलर’ सिलिकोसिस: फेफड़ों को कैसे बचाएं?

नमस्ते! मैं आपका हेल्थ एक्सपर्ट डॉ. मलिक उस्मान (सीनियर हेल्थ एक्सपर्ट, एशिया हॉस्पिटल कानपुर), आज एक महत्वपूर्ण स्वास्थ्य विषय पर बात करने आया हूँ।

## **साइलेंट किलर सिलिकोसिस: धूल से होने वाली यह जानलेवा बीमारी कहीं आपके फेफड़ों को भी तो नहीं बना रही शिकार? ⚠️**

कल्पना कीजिए कि जिस हवा में हम सांस लेते हैं, वही हवा धीरे-धीरे हमारे शरीर के सबसे महत्वपूर्ण अंगों में से एक, हमारे फेफड़ों को अंदर से खोखला कर रही हो। सोचकर ही डर लगता है, है ना? लेकिन दुखद सच्चाई यह है कि यह डर कई कामगारों के लिए रोज़ की ज़िंदगी का हिस्सा है। हम बात कर रहे हैं एक ऐसी अदृश्य और खतरनाक बीमारी की जो धीरे-धीरे हमारे फेफड़ों को पत्थरों में बदल देती है – **सिलिकोसिस**।

कानपुर जैसे औद्योगिक शहर और पूरे उत्तर प्रदेश में, जहाँ निर्माण कार्य, खनन, पत्थर कटाई और ढलाई जैसे उद्योग ज़ोरों पर हैं, वहाँ हज़ारों लोग रोज़ाना बारीक धूल के संपर्क में आते हैं। यह धूल केवल गंदगी नहीं है, बल्कि इसमें छिपा है एक ‘साइलेंट किलर’ जिसे हम क्रिस्टलीय सिलिका कहते हैं। यह बीमारी लाइलाज है, लेकिन पूरी तरह से रोकी जा सकती है। मेरा यह लेख आपको इसी जानलेवा बीमारी के बारे में पूरी जानकारी देगा, ताकि आप खुद को और अपने प्रियजनों को इस खतरे से बचा सकें। आइए, इस गंभीर मुद्दे पर गहराई से बात करें। 🩺

## 1️⃣ समस्या क्या है: सिलिकोसिस क्या है और यह क्यों इतनी ख़तरनाक है?

सिलिकोसिस फेफड़ों से जुड़ी एक गंभीर और लाइलाज बीमारी है, जो सांस के ज़रिए क्रिस्टलीय सिलिका के धूल कणों (Respirable Crystalline Silica – RCS) के फेफड़ों में पहुँचने से होती है। यह धूल इतनी बारीक होती है कि हमारी नाक के बाल और श्वसन प्रणाली के प्राकृतिक फिल्टर इसे रोक नहीं पाते और यह सीधे फेफड़ों की सबसे छोटी हवा की थैलियों (एल्वेओली) तक पहुँच जाती है।

जब ये सिलिका कण फेफड़ों में जमा हो जाते हैं, तो वे फेफड़ों की कोशिकाओं में सूजन और फाइब्रोसिस (ऊतक का मोटा होना और सख्त होना) पैदा करते हैं। सरल शब्दों में कहें तो, फेफड़ों के अंदर छोटे-छोटे पत्थर जैसे घाव बनने लगते हैं। समय के साथ, ये घाव इतने बढ़ जाते हैं कि फेफड़े अपनी लचीलापन खो देते हैं और ऑक्सीजन लेने की उनकी क्षमता कम हो जाती है। यह एक धीमी गति से बढ़ने वाली बीमारी है, जिसके लक्षण कई सालों तक सामने नहीं आते, लेकिन जब तक लक्षण दिखते हैं, तब तक फेफड़ों को काफी नुकसान हो चुका होता है।

यह बीमारी सिर्फ फेफड़ों को ही नहीं, बल्कि शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (Immune system) को भी प्रभावित करती है, जिससे व्यक्ति को टीबी (Tuberculosis) और अन्य फेफड़ों के संक्रमण का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। चूँकि इसका कोई स्थायी इलाज नहीं है, इसलिए बचाव ही एकमात्र उपाय है।

## 2️⃣ इसके मुख्य कारण: किन कामों में होता है सिलिका धूल का खतरा?

सिलिकोसिस का एकमात्र मुख्य कारण **क्रिस्टलीय सिलिका धूल को साँस के ज़रिए अंदर लेना** है। सिलिका एक प्राकृतिक खनिज है जो रेत, ग्रेनाइट, क्वार्ट्ज, मिट्टी और कई अन्य पत्थरों में पाया जाता है। जब इन खनिजों को काटा, तोड़ा, पीसा, खोदा या रेतब्लास्ट किया जाता है, तो बेहद बारीक धूल के कण हवा में मिल जाते हैं। ये कण इतने छोटे होते हैं कि नग्न आँखों से दिखाई नहीं देते, लेकिन यही सबसे खतरनाक होते हैं।

यह बीमारी मुख्य रूप से उन व्यवसायों में काम करने वाले लोगों को प्रभावित करती है जहाँ सिलिका धूल के संपर्क में आने का खतरा सबसे ज़्यादा होता है। उत्तर प्रदेश, विशेषकर कानपुर, बुंदेलखंड और पूर्वांचल के कई इलाकों में जहाँ औद्योगिक गतिविधियां बहुत हैं, वहाँ यह एक बड़ी चिंता का विषय है।

यहाँ कुछ मुख्य कारण और संबंधित उद्योग दिए गए हैं जहाँ सिलिका धूल का जोखिम अधिक होता है:

* **खनन (Mining):** कोयले की खदानें, धातु की खदानें और विशेष रूप से रेत या पत्थर की खदानें।
* **निर्माण कार्य (Construction):** सड़कों, इमारतों, पुलों आदि के निर्माण में पत्थर काटना, कंक्रीट तोड़ना, ड्रिलिंग और खुदाई का काम। कानपुर में मेट्रो निर्माण और फ्लाईओवर परियोजनाओं में काम करने वाले मज़दूरों को विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
* **पत्थर उद्योग (Stone Industry):** पत्थर काटना, पीसना, पॉलिश करना, नक्काशी करना, ग्रेनाइट और मार्बल का काम।
* **रेतब्लास्टिंग (Sandblasting):** सतहों से पेंट, जंग या गंदगी हटाने के लिए रेत का इस्तेमाल करना। यह काम सिलिकोसिस का सबसे तेज़ और घातक कारण बन सकता है।
* **पॉटरी और चीनी मिट्टी के उद्योग (Pottery & Ceramics):** मिट्टी के बर्तन बनाने और चीनी मिट्टी के उत्पादों में इस्तेमाल होने वाली मिट्टी में सिलिका होता है।
* **कांच निर्माण (Glass Manufacturing):** कांच बनाने में रेत का उपयोग होता है।
* **फाउंड्री (Foundries):** धातु की ढलाई में रेत के साँचे (sand molds) का उपयोग होता है।
* **कृषि (Agriculture):** कुछ मामलों में, खेतों में काम करते समय भी सिलिका धूल के संपर्क में आने का खतरा हो सकता है, खासकर सूखे मौसम में।

इन सभी गतिविधियों में, अगर धूल नियंत्रण के सही उपाय नहीं अपनाए जाते, तो मज़दूरों के फेफड़ों में सिलिका के कण जमा होते रहते हैं और धीरे-धीरे उन्हें सिलिकोसिस का शिकार बना देते हैं। यह दशकों तक चलने वाली धीमी प्रक्रिया हो सकती है, जिससे बीमारी की गंभीरता बढ़ जाती है।

## 3️⃣ लक्षण (Symptoms): सिलिकोसिस के संकेत जिन्हें पहचानना है ज़रूरी ❤️‍🩹

सिलिकोसिस के लक्षण अक्सर कई सालों तक दिखाई नहीं देते, क्योंकि फेफड़ों को होने वाला नुकसान धीरे-धीरे होता है। आमतौर पर, धूल के संपर्क में आने के 10 से 20 साल बाद लक्षण उभरना शुरू होते हैं, लेकिन अत्यधिक या तीव्र संपर्क के मामलों में यह कुछ महीनों से लेकर कुछ सालों में भी हो सकता है। जब लक्षण दिखना शुरू होते हैं, तो वे अक्सर अन्य सामान्य श्वसन रोगों (जैसे ब्रोंकाइटिस या अस्थमा) के लक्षणों से मिलते-जुलते हो सकते हैं, जिससे इसकी पहचान करना मुश्किल हो सकता है।

यहाँ सिलिकोसिस के कुछ प्रमुख लक्षण दिए गए हैं:

* **साँस फूलना (Shortness of Breath):** यह सबसे आम और शुरुआती लक्षणों में से एक है। शुरुआत में, यह केवल शारीरिक exertion (जैसे सीढ़ियां चढ़ना या भारी काम करना) के दौरान महसूस होता है, लेकिन जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है, आराम करते समय भी साँस फूल सकती है।
* **लगातार खांसी (Persistent Cough):** अक्सर सूखी खांसी होती है, लेकिन कुछ मामलों में बलगम भी आ सकता है। यह खांसी पुरानी और परेशान करने वाली होती है।
* **छाती में दर्द (Chest Pain):** सीने में भारीपन या दर्द महसूस हो सकता है, जो अक्सर साँस लेने में तकलीफ के साथ जुड़ा होता है।
* **थकान (Fatigue):** बिना किसी स्पष्ट कारण के लगातार थकावट महसूस होना। फेफड़ों की कार्यक्षमता कम होने के कारण शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती।
* **वजन कम होना (Unexplained Weight Loss):** अगर बिना कोशिश किए आपका वजन घट रहा है, तो यह भी एक संकेत हो सकता है, क्योंकि शरीर बीमारी से लड़ने में अधिक ऊर्जा खर्च करता है।
* **बुखार (Fever) और रात को पसीना (Night Sweats):** खासकर यदि सिलिकोसिस के साथ टीबी (क्षय रोग) भी विकसित हो गया हो, जो सिलिकोसिस के रोगियों में आम है।
* **होंठों और उंगलियों का नीला पड़ना (Cyanosis):** बीमारी के गंभीर चरणों में, जब फेफड़े पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं दे पाते, तो त्वचा और होंठ नीले दिखाई दे सकते हैं।
* **फेफड़ों के संक्रमण का खतरा बढ़ना:** सिलिकोसिस वाले लोगों को ब्रोंकाइटिस, निमोनिया और विशेष रूप से टीबी होने का खतरा बहुत अधिक होता है।

यदि आप किसी ऐसे उद्योग में काम करते हैं जहाँ सिलिका धूल का जोखिम है और आपको इनमें से कोई भी लक्षण महसूस होता है, तो इसे नज़रअंदाज़ न करें। तुरंत किसी डॉक्टर, विशेषकर पल्मोनोलॉजिस्ट (फेफड़ों के विशेषज्ञ) से संपर्क करें। शुरुआती पहचान भले ही बीमारी को ठीक न कर सके, लेकिन लक्षणों को प्रबंधित करने और जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने में मदद कर सकती है।

## 4️⃣ बचाव के उपाय (Prevention): सिलिकोसिस से बचने के लिए क्या करें? 🛡️

चूंकि सिलिकोसिस का कोई इलाज नहीं है, इसलिए **बचाव ही एकमात्र और सबसे प्रभावी उपाय है।** यह बीमारी काम करने की जगह पर सही सुरक्षा प्रोटोकॉल अपनाने और व्यक्तिगत सावधानी बरतने से पूरी तरह रोकी जा सकती है। यह केवल कर्मचारियों की ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि नियोक्ताओं (employers) और सरकारी एजेंसियों की भी अहम भूमिका है।

यहाँ सिलिकोसिस से बचाव के कुछ महत्वपूर्ण उपाय दिए गए हैं:

### 4.1. **धूल नियंत्रण के इंजीनियरिंग उपाय (Engineering Controls):**
ये सबसे प्रभावी तरीके हैं क्योंकि ये स्रोत पर ही धूल को नियंत्रित करते हैं।

* **गीली विधियाँ (Wet Methods):** खनन, कटाई, ड्रिलिंग और पीसने जैसे कार्यों में पानी का उपयोग करना। पानी धूल के कणों को हवा में उड़ने से रोकता है। उदाहरण के लिए, कानपुर की पत्थर कटाई इकाइयों में पानी के साथ कटाई करने से धूल का फैलाव काफी कम किया जा सकता है।
* **वेंटिलेशन सिस्टम (Ventilation Systems):** लोकल एग्जॉस्ट वेंटिलेशन (LEV) सिस्टम स्थापित करना जो धूल को स्रोत से सीधे बाहर खींच लेते हैं। सामान्य वेंटिलेशन (General ventilation) भी कार्यस्थल की हवा को शुद्ध रखने में मदद करता है।
* **धूल वाले ऑपरेशंस को बंद जगह में करना (Enclosure/Isolation):** यदि संभव हो तो धूल पैदा करने वाले उपकरणों या प्रक्रियाओं को पूरी तरह से बंद या अलग कमरों में स्थापित करें, ताकि अन्य कर्मचारियों को धूल के संपर्क में आने से बचाया जा सके।
* **स्वचालन (Automation):** कुछ प्रक्रियाओं को स्वचालित करके, श्रमिकों को सीधे धूल भरे वातावरण से दूर रखा जा सकता है।
* **अच्छी साफ-सफाई (Good Housekeeping):** नियमित रूप से वैक्यूम क्लीनर (पानी वाले या HEPA फिल्टर वाले) का उपयोग करके कार्यस्थल की सफाई करना। सूखी झाड़ू लगाने से धूल उड़ती है, इसलिए इससे बचना चाहिए।

### 4.2. **प्रशासनिक नियंत्रण (Administrative Controls):**

* **कार्यकर्ता प्रशिक्षण (Worker Training):** सभी कर्मचारियों को सिलिकोसिस के खतरों, बचाव के तरीकों और व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (PPE) के सही उपयोग के बारे में प्रशिक्षित करें।
* **एक्सपोजर का समय कम करना (Limiting Exposure Time):** यदि संभव हो तो, धूल भरे क्षेत्रों में काम करने वाले कर्मचारियों के समय को सीमित करें और उन्हें अन्य, कम जोखिम वाले कार्यों पर रोटेट करें।
* **हवा की गुणवत्ता की निगरानी (Air Monitoring):** कार्यस्थल पर सिलिका धूल के स्तर की नियमित रूप से निगरानी करें ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि यह अनुमेय सीमा (permissible limits) के भीतर है।
* **साइनबोर्ड और चेतावनी (Signage & Warnings):** जोखिम वाले क्षेत्रों में स्पष्ट चेतावनी संकेत लगाएं।

### 4.3. **व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (Personal Protective Equipment – PPE):**

* **रेस्पिरेटर (Respirators):** जब इंजीनियरिंग और प्रशासनिक नियंत्रण पर्याप्त न हों, तो कर्मचारियों को सही प्रकार के रेस्पिरेटर (जैसे N95 या उससे बेहतर, P100 फिल्टर वाले) पहनने चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि रेस्पिरेटर सही ढंग से फिट होना चाहिए और कर्मचारी को इसे सही तरीके से पहनना आना चाहिए। कानपुर के उन उद्योगों में जहाँ धूल का काम होता है, जैसे चमड़ा उद्योग (जहां कुछ प्रक्रियाओं में धूल बनती है) या निर्माण स्थलों पर, सही रेस्पिरेटर पहनना अत्यंत आवश्यक है।
* **सुरक्षात्मक कपड़े (Protective Clothing):** धूल को कपड़ों पर जमा होने से रोकने के लिए विशेष कपड़े पहनें और काम के बाद उन्हें साफ करें।

### 4.4. **स्वास्थ्य निगरानी (Health Surveillance):**

* **नियमित चिकित्सा जांच (Regular Medical Check-ups):** सिलिका के संपर्क में आने वाले सभी कर्मचारियों की नियमित रूप से चिकित्सा जांच (जैसे छाती का एक्स-रे, फेफड़ों के कार्य परीक्षण) करवाएं ताकि बीमारी का शुरुआती चरणों में पता लगाया जा सके।
* **टीबी की जांच (TB Screening):** चूंकि सिलिकोसिस के रोगियों को टीबी का खतरा अधिक होता है, इसलिए नियमित टीबी की जांच भी बहुत महत्वपूर्ण है।

सरकार और स्थानीय प्रशासन की भूमिका भी इसमें महत्वपूर्ण है। उत्तर प्रदेश सरकार को औद्योगिक सुरक्षा नियमों को और मज़बूत करना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कारखाने और निर्माण स्थल इन नियमों का सख्ती से पालन करें। हमें अपने श्रमिकों के स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए।

## 5️⃣ कब डॉक्टर के पास जाना चाहिए: इन संकेतों को न करें अनदेखा 🚨

सिलिकोसिस एक ऐसी बीमारी है जिसके लक्षण धीरे-धीरे उभरते हैं और अक्सर तब तक दिखाई नहीं देते जब तक फेफड़ों को काफी नुकसान न हो जाए। इसलिए, अगर आप या आपके परिचित किसी भी ऐसे काम से जुड़े हैं जहाँ सिलिका धूल के संपर्क में आने का खतरा है, तो नियमित जांच करवाना बहुत महत्वपूर्ण है।

आपको तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए यदि आप निम्नलिखित में से कोई भी लक्षण अनुभव करते हैं:

* **लगातार या पुरानी खांसी:** खासकर अगर यह महीनों से बनी हुई है और ठीक नहीं हो रही।
* **साँस फूलना:** अगर आपको सामान्य गतिविधियों, जैसे सीढ़ियां चढ़ने, या थोड़ी दूर चलने में भी साँस फूलने लगती है।
* **छाती में दर्द या कसाव:** अगर आपके सीने में लगातार दर्द या दबाव महसूस होता है।
* **अकारण थकान या कमज़ोरी:** अगर आपको बिना किसी स्पष्ट कारण के लगातार थकावट महसूस होती है।
* **अचानक वजन कम होना:** अगर बिना किसी डाइट या व्यायाम के आपका वजन घट रहा है।
* **बुखार या रात को पसीना:** ये टीबी जैसे अन्य संक्रमणों के संकेत हो सकते हैं, जो सिलिकोसिस के रोगियों में आम हैं।

**यह कब और भी ज़रूरी है:**

* **अगर आप उच्च जोखिम वाले पेशे में हैं:** चाहे आप कानपुर में निर्माण मजदूर हों, बुंदेलखंड में खदान श्रमिक हों, या किसी भी ऐसे उद्योग में काम करते हों जहाँ धूल उड़ती हो।
* **अगर आपमें सिलिकोसिस या टीबी का पारिवारिक इतिहास है:** अनुवांशिक कारकों और पर्यावरणीय प्रभावों का संयोजन जोखिम बढ़ा सकता है।

याद रखें, शुरुआती पहचान भले ही सिलिकोसिस को ठीक न कर पाए, लेकिन यह बीमारी की प्रगति को धीमा करने, लक्षणों को प्रबंधित करने और गंभीर जटिलताओं, जैसे टीबी और श्वसन विफलता, को रोकने में मदद कर सकती है। आपके फेफड़े आपकी सबसे मूल्यवान संपत्ति हैं, उनकी उपेक्षा न करें। एशिया हॉस्पिटल कानपुर में हमारी टीम ऐसे मामलों में विशेषज्ञ सलाह देने के लिए हमेशा तैयार है।

## 6️⃣ डॉक्टर की सलाह: स्वस्थ फेफड़ों के लिए मेरा महत्वपूर्ण संदेश 👨‍⚕️🧠

प्रिय पाठकों,

एक हेल्थ एक्सपर्ट के तौर पर, मैं यह ज़ोर देकर कहना चाहता हूँ कि सिलिकोसिस एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या है, खासकर उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में जहाँ औद्योगिक गतिविधियां और निर्माण कार्य बड़े पैमाने पर होते हैं। यह एक ऐसी बीमारी है जो न सिर्फ व्यक्ति की कार्यक्षमता को छीन लेती है, बल्कि उसकी ज़िंदगी को भी खतरे में डाल देती है। लेकिन अच्छी खबर यह है कि यह पूरी तरह से रोकी जा सकती है।

मेरी सबसे बड़ी सलाह यही है कि **रोकथाम ही एकमात्र और सबसे प्रभावी इलाज है।**

1. **नियोक्ता (Employers) ध्यान दें:** आप अपने कर्मचारियों के स्वास्थ्य के संरक्षक हैं। सुरक्षा प्रोटोकॉल में निवेश करना केवल एक लागत नहीं, बल्कि एक ज़िम्मेदारी और दीर्घकालिक निवेश है। सुनिश्चित करें कि कार्यस्थल पर धूल नियंत्रण के सभी उपाय (गीली प्रक्रियाएं, वेंटिलेशन, मशीनरी का अलगाव) लागू हों। अपने कर्मचारियों को सही PPE (रेस्पिरेटर) प्रदान करें और उन्हें उसका सही उपयोग करना सिखाएं। नियमित रूप से हवा की गुणवत्ता की निगरानी करें और स्वास्थ्य जांच कराएं। एक स्वस्थ कार्यबल ही एक उत्पादक कार्यबल होता है।
2. **कर्मचारी (Workers) जागरूक रहें:** अपने अधिकारों और जोखिमों के बारे में जानें। यदि आप किसी ऐसे माहौल में काम करते हैं जहाँ सिलिका धूल मौजूद है, तो बिना संकोच के अपने नियोक्ता से सुरक्षात्मक उपाय और उपकरण मांगें। दिए गए रेस्पिरेटर का सही तरीके से और लगातार उपयोग करें। अपने स्वास्थ्य लक्षणों को कभी नज़रअंदाज़ न करें।
3. **सरकार और नियामक निकाय:** उत्तर प्रदेश सरकार को औद्योगिक सुरक्षा मानकों के सख्त प्रवर्तन पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, विशेषकर कानपुर, गाज़ियाबाद और नोएडा जैसे औद्योगिक केंद्रों में। नियमित निरीक्षण और उल्लंघन करने वालों पर कठोर कार्रवाई आवश्यक है ताकि सभी के लिए सुरक्षित कार्यस्थल सुनिश्चित हो सके।
4. **नियमित स्वास्थ्य जांच:** यदि आप जोखिम वाले पेशे में हैं, तो नियमित रूप से डॉक्टर से मिलें और फेफड़ों की जांच (जैसे छाती का एक्स-रे और पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट) करवाएं। शुरुआती जांच, भले ही बीमारी को ठीक न कर सके, जीवन की गुणवत्ता में सुधार और जटिलताओं को रोकने में महत्वपूर्ण है।
5. **धूम्रपान छोड़ें:** धूम्रपान फेफड़ों को और भी कमज़ोर करता है, जिससे सिलिकोसिस के प्रभाव गंभीर हो जाते हैं और अन्य फेफड़ों की बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।

आपके फेफड़े अनमोल हैं। उन्हें स्वच्छ और सुरक्षित रखें। सिलिकोसिस जैसी बीमारियों के प्रति जागरूकता और सक्रिय रोकथाम ही हमें एक स्वस्थ और सुरक्षित भविष्य की ओर ले जा सकती है। अपने स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें, क्योंकि स्वस्थ जीवन ही सच्ची दौलत है। यदि आपके कोई प्रश्न हैं या आपको किसी विशेषज्ञ सलाह की आवश्यकता है, तो एशिया हॉस्पिटल कानपुर की टीम आपकी मदद के लिए हमेशा मौजूद है।

स्वस्थ रहें, सुरक्षित रहें!
डॉ. मलिक उस्मान
सीनियर हेल्थ एक्सपर्ट, एशिया हॉस्पिटल कानपुर

यह जानकारी केवल स्वास्थ्य जागरूकता के लिए दी गई है। किसी भी दवा या उपचार को शुरू करने से पहले डॉक्टर की सलाह अवश्य लें।

डॉ. मलिक उस्मान
सीनियर हेल्थ एक्सपर्ट
एशिया हॉस्पिटल, कानपुर

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