कानपुर में खतरनाक धूल: सिलिकोसिस फेफड़ों का खामोश दुश्मन, ऐसे करें बचाव।

नमस्ते! मैं आपका हेल्थ एक्सपर्ट डॉ. मलिक उस्मान (सीनियर हेल्थ एक्सपर्ट, एशिया हॉस्पिटल कानपुर), आज एक महत्वपूर्ण स्वास्थ्य विषय पर बात करने आया हूँ।

## खतरनाक रेत की धूल: सिलिकोसिस – फेफड़ों का वह खामोश दुश्मन जो जीवन छीन सकता है! ⚠️

क्या आपने कभी सोचा है कि जिस धूल-मिट्टी से हम हर रोज़ रूबरू होते हैं, वह हमारे शरीर के भीतर जाकर कितना बड़ा नुकसान कर सकती है? खासकर अगर आप ऐसे किसी पेशे से जुड़े हैं जहाँ पत्थरों, रेत या मिट्टी का काम होता है? उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में, जहाँ निर्माण कार्य, खनन और औद्योगिक गतिविधियाँ तेज़ी से बढ़ रही हैं, वहाँ एक ख़तरनाक बीमारी चुपचाप हमारे फेफड़ों को निशाना बना रही है – और उसका नाम है “सिलिकोसिस”। यह एक ऐसा “खामोश दुश्मन” है जो सालों तक बिना किसी बड़े लक्षण के आपके फेफड़ों को भीतर से खोखला करता रहता है, और जब तक इसका पता चलता है, तब तक अक्सर बहुत देर हो चुकी होती है।

आज हम इस गंभीर और जानलेवा बीमारी के बारे में विस्तार से जानेंगे, ताकि हम न सिर्फ खुद को बल्कि अपने आस-पास के उन मेहनती लोगों को भी इसके चंगुल से बचा सकें, जिनकी जान इस धूल-मिट्टी के कारण खतरे में है। मेरा उद्देश्य आपको केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि आपको जागरूक और सशक्त बनाना है ताकि आप अपने स्वास्थ्य की रक्षा कर सकें। तो आइए, इस अदृश्य खतरे को पहचानें और इससे लड़ने के लिए तैयार रहें। 🫁🩺

1️⃣ समस्या क्या है

सिलिकोसिस फेफड़ों की एक गंभीर और असाध्य (irreversible) बीमारी है जो क्रिस्टलीय सिलिका (crystalline silica) नामक धूल के महीन कणों को लंबे समय तक सांस लेने के कारण होती है। क्रिस्टलीय सिलिका एक प्राकृतिक खनिज है जो रेत, चट्टानों, ग्रेनाइट, क्वार्ट्ज और कई अन्य खनिजों में पाया जाता है। जब इन सामग्रियों को काटा, पीसा, तोड़ा या ड्रिल किया जाता है, तो बेहद छोटे सिलिका धूल के कण हवा में मिल जाते हैं। ये कण इतने छोटे होते हैं कि नग्न आँखों से दिखाई भी नहीं देते और आसानी से हमारी सांस के साथ फेफड़ों में पहुँच जाते हैं।

फेफड़ों के भीतर पहुँचने पर, ये सिलिका कण फेफड़ों के ऊतकों (tissues) में सूजन और निशान (scarring) पैदा करना शुरू कर देते हैं। समय के साथ, ये निशान सख्त और मोटे हो जाते हैं, एक ऐसी स्थिति पैदा करते हैं जिसे ‘फाइब्रोसिस’ (fibrosis) कहते हैं। इस फाइब्रोसिस के कारण फेफड़े अपनी लचीलापन खो देते हैं और ऑक्सीजन को रक्त में प्रभावी ढंग से स्थानांतरित करने की क्षमता कम हो जाती है। यह प्रक्रिया धीरे-धीरे होती है, कई बार दशकों तक चलती रहती है, और अंततः फेफड़ों की कार्यक्षमता को इतना कम कर देती है कि व्यक्ति को सांस लेने में गंभीर परेशानी होने लगती है, जिससे उसका जीवन बुरी तरह प्रभावित होता है। सिलिकोसिस को अक्सर एक “ऑक्यूपेशनल लंग डिजीज” (Occupational Lung Disease) यानी व्यावसायिक फेफड़ों की बीमारी के रूप में जाना जाता है, क्योंकि यह मुख्य रूप से कुछ खास पेशों से जुड़े लोगों को प्रभावित करती है। ⚠️

2️⃣ इसके मुख्य कारण

जैसा कि मैंने बताया, सिलिकोसिस का एकमात्र और मुख्य कारण क्रिस्टलीय सिलिका धूल के कणों को सांस के ज़रिए फेफड़ों तक पहुँचाना है। यह उन लोगों में सबसे ज़्यादा देखने को मिलता है जो ऐसे उद्योगों या व्यवसायों में काम करते हैं जहाँ सिलिका युक्त सामग्री का प्रसंस्करण या इस्तेमाल होता है। कानपुर जैसे औद्योगिक शहर और पूरे उत्तर प्रदेश में, जहाँ निर्माण और खनन गतिविधियों का बड़ा बोलबाला है, यह एक बड़ी चुनौती है।

आइए, उन मुख्य कारणों और जोखिम वाले पेशों पर नज़र डालें:

* **निर्माण कार्य (Construction Work):** 🏗️
* कंक्रीट, पत्थर, ईंट और रेत को काटना, पीसना, तोड़ना या ड्रिल करना।
* सुरंग बनाना (tunneling), सड़क निर्माण (road construction)।
* पुरानी इमारतों को तोड़ना (demolition)।
* सीमेंट के साथ काम करना।
* उत्तर प्रदेश में मेट्रो निर्माण, एक्सप्रेसवे और बड़े शहरी विकास परियोजनाओं में कार्यरत श्रमिक इस जोखिम के दायरे में आते हैं।

* **खनन (Mining):** ⛏️
* कोयला, सोना, तांबा, लौह अयस्क और अन्य खनिजों का खनन।
* खदानों में पत्थर और रेत का उत्खनन (quarrying)।
* खासकर बुंदेलखंड क्षेत्र में रेत और पत्थर खनन से जुड़े मजदूर।

* **पत्थर तोड़ना (Stone Crushing) और रेत का काम:**
* पत्थर तोड़ने वाली इकाइयाँ (stone crushers) और रेत उत्खनन (sand excavation) करने वाले मजदूर।
* उत्तर प्रदेश के कई जिलों में यह एक प्रमुख उद्योग है।

* **फाउंड्री और मेटल कास्टिंग (Foundry & Metal Casting):**
* रेत के सांचों का उपयोग करके धातु की ढलाई।
* सैंडब्लास्टिंग (sandblasting) प्रक्रिया, जिसमें सतहों को साफ करने के लिए रेत का इस्तेमाल होता है।

* **कांच और सिरेमिक उद्योग (Glass & Ceramic Industry):**
* कांच, मिट्टी के बर्तन, टाइल और चीनी मिट्टी के निर्माण में सिलिका युक्त कच्चे माल का उपयोग।
* कानपुर में कई ऐसे छोटे उद्योग हैं जहाँ श्रमिक सीधे इस जोखिम के संपर्क में आते हैं।

* **अन्य पेशे:**
* पोटरी बनाना (pottery), मूर्तियां बनाना।
* सजावटी पत्थरों पर नक्काशी करना।
* डेनिम सैंडब्लास्टिंग (denim sandblasting) (कपड़ों को घिसा हुआ लुक देने के लिए)।

यह समझना ज़रूरी है कि यह बीमारी रात भर में नहीं होती। सिलिका धूल के संपर्क में आने के वर्षों या दशकों बाद ही इसके लक्षण दिखाई देते हैं। जितना अधिक समय और जितनी अधिक तीव्रता से कोई व्यक्ति इस धूल के संपर्क में रहता है, सिलिकोसिस विकसित होने का जोखिम उतना ही अधिक होता है।

3️⃣ लक्षण (Symptoms)

सिलिकोसिस के लक्षण अक्सर धीरे-धीरे विकसित होते हैं, और कई मामलों में, प्रारंभिक चरण में कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। यही वजह है कि इसे “खामोश दुश्मन” कहा जाता है। लक्षण आमतौर पर सिलिका धूल के संपर्क में आने के कई साल या दशक बाद ही उभरते हैं। हालाँकि, गंभीर और तीव्र संपर्क के मामलों में, लक्षण कुछ महीनों या सालों में भी दिख सकते हैं।

आइए, सिलिकोसिस के मुख्य लक्षणों पर एक नज़र डालें:

* **सांस लेने में तकलीफ (Shortness of Breath):** 🌬️
* यह सबसे आम और शुरुआती लक्षणों में से एक है। शुरुआत में केवल शारीरिक गतिविधि के दौरान सांस फूलना, लेकिन बीमारी बढ़ने पर आराम करते समय भी सांस लेने में मुश्किल होना।
* मरीज को लगता है कि उसे पर्याप्त हवा नहीं मिल रही है।

* **लंबे समय तक खांसी (Persistent Cough):** 😷
* सूखी या कफ वाली खांसी जो लगातार बनी रहती है और ठीक नहीं होती।
* कुछ मामलों में, कफ के साथ खून भी आ सकता है, खासकर अगर बीमारी बहुत बढ़ गई हो।

* **थकान और कमज़ोरी (Fatigue and Weakness):** 😴
* बिना किसी कारण के लगातार थकान महसूस होना।
* शरीर में ऊर्जा की कमी और कमज़ोरी।

* **सीने में दर्द या जकड़न (Chest Pain or Tightness):**
* सीने में हल्का या तेज़ दर्द महसूस हो सकता है, या ऐसा लग सकता है जैसे सीना जकड़ गया हो।

* **बुखार (Fever):** 🔥
* कभी-कभी, विशेष रूप से जब फेफड़े संक्रमित हो जाते हैं (जैसे टीबी के साथ), तो हल्का बुखार आ सकता है।

* **वजन कम होना (Weight Loss):** 📉
* अकारण ही शरीर का वजन कम होना। यह गंभीर बीमारी का संकेत हो सकता है, क्योंकि शरीर को ऊर्जा के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ती है।

* **होंठों और उंगलियों का नीला पड़ना (Cyanosis):**
* गंभीर मामलों में, शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन न मिल पाने के कारण होंठ और उंगलियां नीली पड़ सकती हैं।

* **टीबी का खतरा बढ़ना (Increased Risk of Tuberculosis):** ⚠️
* सिलिकोसिस फेफड़ों को टीबी (क्षय रोग) के प्रति अधिक संवेदनशील बना देता है। सिलिकोसिस वाले व्यक्तियों में टीबी विकसित होने की संभावना सामान्य लोगों की तुलना में बहुत अधिक होती है।

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ये लक्षण कई अन्य श्वसन संबंधी बीमारियों (जैसे अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, सीओपीडी) के समान हो सकते हैं। इसलिए, यदि आप किसी ऐसे पेशे से जुड़े हैं जिसमें सिलिका धूल का जोखिम है और आपको इनमें से कोई भी लक्षण अनुभव होता है, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

4️⃣ बचाव के उपाय (Prevention)

चूँकि सिलिकोसिस का कोई इलाज नहीं है, इसलिए बचाव ही एकमात्र प्रभावी उपाय है। सही जानकारी और उचित सुरक्षा उपायों को अपनाकर हम इस जानलेवा बीमारी से बच सकते हैं। चाहे आप श्रमिक हों, मालिक हों या सरकारी अधिकारी, हर किसी की अपनी भूमिका है।

**व्यक्तिगत स्तर पर बचाव (Workers’ Responsibility):**

* **सही रेस्पिरेटर पहनें:** 😷
* सिलिका धूल वाले वातावरण में काम करते समय हमेशा N95 या उससे ऊपर का अनुमोदित रेस्पिरेटर (mask) पहनें। यह सुनिश्चित करें कि मास्क आपके चेहरे पर ठीक से फिट हो। साधारण कपड़े का मास्क या सर्जिकल मास्क धूल के बारीक कणों को रोकने में प्रभावी नहीं होता।
* मास्क को सही तरीके से लगाना और उसकी नियमित सफाई या बदलना भी ज़रूरी है।

* **स्वच्छता बनाए रखें:**
* धूल वाले क्षेत्रों में कुछ भी खाने, पीने या धूम्रपान करने से बचें।
* काम खत्म करने के बाद अपने हाथ और चेहरा अच्छी तरह धोएं।
* काम के कपड़े घर ले जाने से पहले बदल लें और उन्हें अलग से धोएं ताकि परिवार के अन्य सदस्यों को धूल के संपर्क में आने से बचाया जा सके।
* जूते और कपड़ों से धूल को झाड़ लें।

* **धूम्रपान छोड़ें:** 🚬❌
* धूम्रपान फेफड़ों को और भी ज़्यादा नुकसान पहुँचाता है और सिलिकोसिस के लक्षणों को बढ़ा सकता है। यह टीबी और अन्य श्वसन संबंधी बीमारियों का खतरा भी बढ़ाता है।

* **जागरूक रहें:**
* अपने कार्यस्थल पर सिलिका धूल के खतरों और सुरक्षा उपायों के बारे में जानकारी प्राप्त करें। यदि आपको कोई चिंता है तो अपने सुपरवाइजर या डॉक्टर से बात करें।

**कार्यस्थल पर बचाव (Employers’ Responsibility):**

* **धूल नियंत्रण के तरीके (Dust Control Methods):**
* **गीले तरीके (Wet Methods):** धूल को हवा में फैलने से रोकने के लिए पानी का छिड़काव करें या गीली कटाई/ड्रिलिंग तकनीकों का उपयोग करें।
* **वेंटिलेशन (Ventilation):** कार्यस्थलों पर उचित वेंटिलेशन सिस्टम स्थापित करें जो धूल को बाहर निकाल सके।
* **संलग्न प्रणाली (Enclosed Systems):** जहाँ संभव हो, धूल पैदा करने वाली प्रक्रियाओं को बंद कर दें या उन्हें ऐसे कवर से घेर दें जो धूल को फैलने से रोकें।
* **वैक्यूम क्लीनिंग (Vacuum Cleaning):** सूखी झाड़ू लगाने के बजाय औद्योगिक वैक्यूम क्लीनर का उपयोग करें जो धूल को फिर से हवा में नहीं फैलाते।

* **व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (PPE) प्रदान करना:**
* श्रमिकों को उचित रेस्पिरेटर और अन्य सुरक्षा उपकरण मुफ्त में प्रदान करें।
* यह सुनिश्चित करें कि श्रमिक उनका सही उपयोग करें और उन्हें पहनने के तरीके पर प्रशिक्षित करें।

* **नियमित वायु गुणवत्ता निगरानी:** 🌬️
* कार्यस्थल पर सिलिका धूल के स्तर की नियमित रूप से निगरानी करें ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वे सुरक्षित सीमा के भीतर हैं।

* **स्वास्थ्य निगरानी कार्यक्रम:** 🩺
* उच्च जोखिम वाले श्रमिकों के लिए नियमित चिकित्सा जाँच, जिसमें छाती का एक्स-रे और फेफड़ों के कार्य परीक्षण (lung function tests) शामिल हों, आयोजित करें। प्रारंभिक पहचान बेहद महत्वपूर्ण है।
* कानपुर और उत्तर प्रदेश में खासकर खनन और निर्माण क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिकों के लिए ऐसे कार्यक्रम अनिवार्य होने चाहिए।

* **प्रशिक्षण और जागरूकता:**
* श्रमिकों को सिलिकोसिस के खतरों, इसके लक्षणों और बचाव के उपायों के बारे में नियमित प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रम प्रदान करें। उन्हें अपनी स्वास्थ्य रिपोर्टों तक पहुँच प्रदान करें।

**सरकारी और नियामक स्तर पर भूमिका:**
* सरकारी एजेंसियों को सिलिका धूल के जोखिम को नियंत्रित करने के लिए कड़े नियम लागू करने और उनका पालन सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। उत्तर प्रदेश सरकार इस दिशा में सक्रिय कदम उठाकर श्रमिकों के स्वास्थ्य की रक्षा कर सकती है।

5️⃣ कब डॉक्टर के पास जाना चाहिए

सिलिकोसिस एक ऐसी बीमारी है जिसके लक्षण कई सालों बाद दिखते हैं, इसलिए अगर आप ऐसे किसी जोखिम वाले पेशे में काम करते हैं, तो लक्षणों का इंतज़ार न करें। शुरुआती पहचान और रोकथाम ही आपकी सबसे बड़ी सुरक्षा है।

आपको तुरंत किसी अनुभवी डॉक्टर, खासकर पल्मोनोलॉजिस्ट (फेफड़ों के विशेषज्ञ) के पास जाना चाहिए यदि:

* **आप जोखिम वाले पेशे में हैं:** ⚠️
* यदि आप खनन, निर्माण, पत्थर तोड़ने, रेत के काम, फाउंड्री या किसी भी ऐसे उद्योग में काम करते हैं जहाँ क्रिस्टलीय सिलिका धूल का जोखिम है, तो आपको नियमित जांच करानी चाहिए, भले ही आपको कोई लक्षण न हों। यह कानपुर या उत्तर प्रदेश के किसी भी कोने में रहने वाले श्रमिक के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है।

* **आपको लगातार खांसी है:** 😷
* यदि आपको लगातार खांसी हो रही है जो हफ्तों या महीनों से बनी हुई है और ठीक नहीं हो रही है।
* खासकर यदि खांसी के साथ बलगम या खून भी आ रहा हो।

* **सांस लेने में तकलीफ:** 🌬️
* यदि आपको व्यायाम करते समय या सामान्य गतिविधियों के दौरान सांस फूलने लगती है, जो पहले नहीं होती थी।
* यदि आराम करते समय भी सांस लेने में कठिनाई महसूस हो।

* **छाती में दर्द या जकड़न:**
* यदि आपको सीने में लगातार दर्द या भारीपन महसूस होता है।

* **अकारण थकान या वजन कम होना:**
* यदि आप बिना किसी स्पष्ट कारण के लगातार थका हुआ महसूस करते हैं या आपका वजन कम हो रहा है।

* **टीबी का संक्रमण:**
* सिलिकोसिस वाले लोगों में टीबी का खतरा बहुत बढ़ जाता है। यदि आपको टीबी के कोई भी लक्षण (जैसे लगातार खांसी, बुखार, रात को पसीना, वजन कम होना) दिखें, तो तुरंत डॉक्टर से मिलें।

**याद रखें:**

* **शुरुआती पहचान जीवन बचा सकती है:** सिलिकोसिस का कोई इलाज नहीं है, लेकिन शुरुआती पहचान से बीमारी की प्रगति को धीमा करने और लक्षणों को प्रबंधित करने में मदद मिल सकती है।
* **अपने कार्य इतिहास के बारे में बताएं:** डॉक्टर को अपने कार्य इतिहास, खासकर सिलिका धूल के संपर्क में आने की जानकारी अवश्य दें। यह निदान में बहुत मदद करता है।
* **नियमित जांच करवाएं:** यदि आप जोखिम वाले पेशे में हैं, तो अपने नियोक्ता द्वारा प्रदान की गई या स्वयं से नियमित स्वास्थ्य जांच (छाती का एक्स-रे, फेफड़ों के कार्य परीक्षण) करवाएं।

अपने स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें। एक अनुभवी डॉक्टर ही सही निदान और मार्गदर्शन प्रदान कर सकते हैं।

6️⃣ डॉक्टर की सलाह

मेरे प्यारे दोस्तों और मेहनती श्रमिकों, सिलिकोसिस एक गंभीर चुनौती ज़रूर है, लेकिन यह एक ऐसी बीमारी है जिससे बचाव संभव है। एक हेल्थ एक्सपर्ट के तौर पर, मेरी आपसे यही गुज़ारिश है कि आप अपने स्वास्थ्य के प्रति ज़रा भी लापरवाही न बरतें। आपका स्वास्थ्य सिर्फ आपका नहीं, आपके परिवार और आपके समाज के लिए भी अनमोल है।

यहां कुछ महत्वपूर्ण बातें हैं जिन्हें आपको हमेशा याद रखना चाहिए:

1. **जानकारी ही शक्ति है (Knowledge is Power):** 🧠
* सिलिकोसिस के बारे में पूरी जानकारी रखें। जानें कि यह कैसे होता है, इसके लक्षण क्या हैं और सबसे महत्वपूर्ण, इससे कैसे बचा जा सकता है।
* अपने कार्यस्थल पर होने वाले जोखिमों को पहचानें और उनसे बचने के तरीकों के बारे में सवाल पूछने में संकोच न करें।

2. **सुरक्षा को प्राथमिकता दें (Prioritize Safety):**
* यदि आप सिलिका धूल के संपर्क में आने वाले किसी भी पेशे में हैं, तो हमेशा उचित व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (PPE) का उपयोग करें, विशेष रूप से प्रमाणित N95 रेस्पिरेटर।
* न केवल खुद मास्क पहनें, बल्कि अपने साथियों को भी ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करें। यह सिर्फ आपकी नहीं, सबकी सुरक्षा का मामला है।
* अपने नियोक्ता से सुरक्षित कार्य वातावरण सुनिश्चित करने की मांग करें। धूल नियंत्रण के तरीकों, जैसे पानी का छिड़काव और उचित वेंटिलेशन, पर ज़ोर दें।

3. **नियमित स्वास्थ्य जांच (Regular Health Check-ups):** 🩺
* यदि आप जोखिम वाले पेशे में हैं, तो लक्षणों का इंतज़ार न करें। नियमित रूप से अपने फेफड़ों की जांच करवाएं। छाती का एक्स-रे और पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट (PFT) सिलिकोसिस का शुरुआती पता लगाने में सहायक होते हैं।
* कानपुर और उत्तर प्रदेश के औद्योगिक क्षेत्रों में कई संगठन और सरकारी स्वास्थ्य केंद्र हैं जो ऐसी जांचों में मदद कर सकते हैं।

4. **स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं (Adopt a Healthy Lifestyle):** ❤️
* धूम्रपान छोड़ दें! धूम्रपान फेफड़ों को पहले से ही कमज़ोर करता है और सिलिकोसिस के साथ मिलकर यह स्थिति को और भी बदतर बना देता है।
* पौष्टिक आहार लें और नियमित रूप से हल्का व्यायाम करें। यह आपके फेफड़ों और समग्र स्वास्थ्य को मज़बूत रखने में मदद करेगा।

5. **संकोच न करें, सलाह लें (Don’t Hesitate, Seek Advice):**
* यदि आपको कोई भी लक्षण दिखाई दें या कोई स्वास्थ्य संबंधी चिंता हो, तो तुरंत किसी अनुभवी डॉक्टर, खासकर छाती रोग विशेषज्ञ (पल्मोनोलॉजिस्ट) से संपर्क करें।
* अपने कार्य इतिहास के बारे में स्पष्ट रूप से बताएं ताकि डॉक्टर सही निदान कर सकें।

याद रखें, सिलिकोसिस एक ऐसी बीमारी है जिसका कोई इलाज नहीं है, लेकिन इसकी **पूरी तरह से रोकथाम संभव है**। आपकी जागरूकता, आपके द्वारा अपनाई गई सावधानियां और आपके नियोक्ता की ज़िम्मेदारी ही आपको इस अदृश्य दुश्मन से बचा सकती है। हम सब मिलकर इस बीमारी के खिलाफ लड़ सकते हैं और अपने देश के मेहनती श्रमिकों के जीवन को सुरक्षित कर सकते हैं।

स्वस्थ रहें, सुरक्षित रहें!

आपका हेल्थ एक्सपर्ट,
डॉ. मलिक उस्मान
(सीनियर हेल्थ एक्सपर्ट, एशिया हॉस्पिटल कानपुर)

यह जानकारी केवल स्वास्थ्य जागरूकता के लिए दी गई है। किसी भी दवा या उपचार को शुरू करने से पहले डॉक्टर की सलाह अवश्य लें।

डॉ. मलिक उस्मान
सीनियर हेल्थ एक्सपर्ट
एशिया हॉस्पिटल, कानपुर

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *